
फ़िल्म इंडस्ट्रीज में सुभाष घई को “शो मैन” का दर्जा प्राप्त है और शायद इसकी वज़ह भी है । वो साल में सिर्फ़ एक ही फ़िल्म बनाते हैं, कैमरे के विभिन्न कोणों का प्रयोग वे बखूबी जानते हैं । उनकी हर फ़िल्म में शास्त्रीय संगीत का मिश्रण और आकर्षक लोकेशन फ़िल्म को भव्यता प्रदान करता है । जिसके वे माहिर खिलाड़ी हैं । सुभाष घई के निर्देशन में बनने वाली हर फ़िल्म प्रदर्शन से पहले ही हीट मानी जाती थी, क्योंकि उनकी फ़िल्म का हर पक्ष ( जैसे - स्टोरी, संगीत, सिनेमाटोग्राफी, डांस, डायलोग ) काफ़ी मजबूती से फ़िल्म के साथ खड़ा होता था । इसके कई उदाहरण भी हैं, (जैसे- राम लखन, कर्मा, खलनायक, ताल, मेरी जंग, परदेश, हीरो, सौदागर…) ।
पिछले कुछ सालों से “किसना” और “यादें” के रूप में लगातार फ्लॉप फिल्में बना रहें हैं । जिसको मैं सहज रूप से पचा नहीं पता हूँ , क्योंकि मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ । मुझे उनकी हर फिल्मों का बडी बेसब्री से इंतजार होता है । जाहिर है , मुझे फ़िल्म “युवराज” का भी बड़ी शिदत से इंतजार था ।
“युवराज” का सबसे कमजोर पक्ष फिल्म की कहानी ही है , जो दर्शको को सिनेमा हॉल में ३ घंटे तक बैठा पाने में असफल साबित हो सकती है ।
योगेन्द्र युवराज (जावेद शेख) अपने बेटे, देवेन (सलमान) को किसी बात पर घर से निकाल देता है । देवेन अपनी प्रेमिका, अनुष्का (कैटरिना) के साथ “कोरस गायक” के रूप में कहीं और अपनी जिंदगी जी रहा है । मगर अनुष्का का बाप, डॉक्टर बेंटन (बोमन), देवेन को पसंद नहीं करता है, क्योंकि वो उसके हैसियत से मेल नहीं खाता है । देवेन और बेंटन के बीच एक समझौता होता है की अगर ४० दिनों के भीतर वो 1 बिलियन नहीं ला पाता है तो अनुष्का की शादी किसी और के साथ कर देगा । अचानक देवेन को पता लगता है की उसके बाप की मौत हो गई । अब देवेन लंदन का रुख करता है जाएदाद में हिस्सा लेने के लिए । वहाँ योगेंद्र का वकील, सिकन्दर मिर्जा (मिथुन) पुरे परिवार के सामने जब वसीयत पढ़कर सुनाता है तो सबके होश उड़ जातें हैं । दरअसल सारी सम्पति देवेन के बड़े भाई, ज्ञानेश (अनिल कपूर, जो एक मानसिक रोगी है ) को मिल जाती है । अब शुरू होती है सम्पति हासिल की साजिश ,जिसमें परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने स्तर से इस खेल में शामिल जातें हैं । सुखद अंत है, देवेन संपत्ति का लालच त्यागकर रिश्तों को अहमियत देतें हैं ।
इस फ़िल्म का सबसे मजबूत पक्ष संगीत है । “तु मुस्कुरा” और “तु मेरी दोस्त है” , जैसे गीत तो दिलों को छू जातें हैं । कबीर लाल की सिनेमाटोग्राफी लाजवाब है, जो गाने को देखने में भी आँखों को ठंढक प्रदान करती है । फिल्म में वायलन की धुनें, दिल में छुपे एहसास को कुरेदती है । फिल्म “ताल” के बाद एक बार फिर “ए आर रहमान” ने सुभाष घई के भरोसे को कायम रखा है । अनिल कपुर का अभिनय शानदार है ।कुल मिलाकर फिल्म की कहानी में पकड़ नहीं है ।
मुझे उम्मीद है कि घई साहब जब भी अपनी अगली फिल्म का स्क्रीप्ट लिखेंगे, उस वक्त मुझ जैसे फैन के बारे में जरूर सोंचेंगे ।

2 comments:
thik hai. narayan narayan
आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे..... हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
Post a Comment