Wednesday, December 24, 2008

धोनी का मन्दिर

ये भारत है , ये अपना इंडिया है, यहाँ कुछ भी संभव है । धोनी फैन्स क्लब ने रांची में धोनी का मन्दिर बनवाने का फ़ैसला किया है । एक इंसान को भगवान बनाने की पागलपन कोशिश ।
न्यूज़ चैनल वालों ने उस जगह को पूरे ग्राफिक्स के साथ दिखाया जहाँ पर 'धोनी भगवान' के मन्दिर का निर्माण कार्य चल रहा है । फलां जगह पर धोनी की मूर्ति होगी , वहां पे भव्य गेट होगा, वहां पे श्रधालुओं के बैठने की जगह होगी, वगैरह-वगैरह ............।
मुझे किसी के निजी विचारों से कोई परेशानी नहीं है लेकिन वो निजी विचार अगर सार्वजनिक कर दिए जाए तो तकलीफ हो सकती है क्योंकि ये करोड़ों लोगों के आस्था और श्रद्धा से जुड़ा विषय है । 'भगवान' कोई उपाधि नही है जो किसी को पुरस्कार स्वरूप प्रदान कर दी जाए । ये तो हमारे संस्कारों में रचा बसा है ।
अगर आप किसी को सम्मान देना चाहते है तो उस सम्मान को व्यक्त करने के और भी रास्ते है । आप धोनी के नाम से संग्रहालय और स्टेडियम भी बनबा सकते है, मगर भगवान का इस तरह मजाक बनाना ठीक नही ।
धोनी के माता पिता ने इस मुद्दे को लेकर जोरदार विरोध जताया है, कि अगर फैन्स क्लब वालों ने इस काम को तुंरत नहीं रोका तो उनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्यवाई करेंगे । उनका तर्क है कि हमारे यहाँ मरे लोगों के साथ ऐसा होता है लेकिन हमारा तर्क ईशवर के अस्तित्व के मजाक बनाने को लेकर है ।
किसी को कोई हक़ नहीं बनता कि वो सदियों पुरानी चली आ रही करोड़ों लोगों के भगवान के प्रति श्रद्धा और विस्वास का इस तरह मजाक बनाए । अगर इसी तरह इंसानों के मन्दिर बनाए जाने लगे तो इंसान और भगवान में क्या फर्क रह जाएगा ?

Tuesday, December 2, 2008

आम जनता, आतंकवाद और राजनीति

26-11-2008, मुंबई में अब तक का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला । इस हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया । समुन्द्र के रास्ते करीब १०-१५ आतंकवादियों का जत्था, बड़ी मात्रा में असहलों के साथ मुंबई में प्रवेश कर जाता है, ये इस बात को प्रमाणित करता है कि हमारा समुंद्री तट कितना सुरक्षित है ? भारत एक ऐसा देश बन चुका है, जहाँ कोई भी आसानी से दहशत को अंजाम दे सकता है । इस आतंकवाद का सबसे आसान टारगेट आम जनता ही होती है, जिसमें कई घर इस बर्बादी के शिकार हो जातें हैं, कई परिवार विखर जातें हैं ।

इस घटना के बाद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री "आर आर पाटिल" का बयान आता है कि "मुंबई एक बड़ा शहर है और ऐसी छोटी मोटी घटनाएं होती रहती है"। अगर इस दुर्घटना में उनके परिवार का कोई सदस्य मारा जाता, तब भी ये हादसा छोटा मोटा ही होता ? हर आतंकवादी हमले के बाद नेताओं का रटा-रटाया बयान आता है ,कि
"ये कायराना हरकत है",
"हमें आतंकवाद के ख़िलाफ़ सख्ती से निपटने कि जरुरत है",
"हम इसकी निंदा करते हैं",
"आतंकवाद को अब और बर्दाश्त नहीं किया जायगा", वगैरह-वगैरह....................। अब हमलोग इस बयानबाजी से उब चुके हैं । आतंकवादी हमले के बाद "संजय निरुपम" जब जनता के बीच गए तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा । देश में कई जगहों पर लोगों ने नेताओं के ख़िलाफ़ बिरोध प्रदर्शन किया । ये इस बात को प्रमाणित करता है कि हमें अब बयानबाजी नहीं, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम चाहिए । शिवराज पाटिल इस देश के गृह मंत्री थे, इस घटना को रोकने की जिम्मेदारी उनकी थी, लेकिन उनका ज्यादा वक्त ड्रेस डिजायनिंग में ही गुजरता था ।

इस देश की सुरक्षा एजेंसियां भी अपने आपको श्रेष्ठ होने की दौर में ही शामिल रखती है, की मैंने तो ये सुचना २ साल पहले ही दे दी थी, अब आपने नहीं किया तो मैं क्या करूं ।

अब ये आतंकवादी देश के बड़े होटलों के टारगेट कर रहें हैं, जिससे आम लोगों के साथ साथ देश के धनाढ्य वर्ग के लोगों पर भी हमला किया जा सके, ताकि इस देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया जा सके ।

अब वक्त आ गया है, कि देश के सभी बड़े नेता इमानदारी पूर्वक आपस में मिलजुलकर आत्ममंथन करें, कि क्या वे वाकई इस देश की सुरक्षा के प्रति उतने गंभीर हैं, जितनी आम लोगों को उनसे उम्मीदें हैं ? वोटों की राजनीति से ज्यादा जरुरी है हमारे देश का आत्मसम्मान ।

Monday, November 24, 2008

सुभाष घई का घटता क्रेज़


फ़िल्म इंडस्ट्रीज में सुभाष घई को “शो मैन” का दर्जा प्राप्त है और शायद इसकी वज़ह भी है । वो साल में सिर्फ़ एक ही फ़िल्म बनाते हैं, कैमरे के विभिन्न कोणों का प्रयोग वे बखूबी जानते हैं । उनकी हर फ़िल्म में शास्त्रीय संगीत का मिश्रण और आकर्षक लोकेशन फ़िल्म को भव्यता प्रदान करता है । जिसके वे माहिर खिलाड़ी हैं । सुभाष घई के निर्देशन में बनने वाली हर फ़िल्म प्रदर्शन से पहले ही हीट मानी जाती थी, क्योंकि उनकी फ़िल्म का हर पक्ष ( जैसे - स्टोरी, संगीत, सिनेमाटोग्राफी, डांस, डायलोग ) काफ़ी मजबूती से फ़िल्म के साथ खड़ा होता था । इसके कई उदाहरण भी हैं, (जैसे- राम लखन, कर्मा, खलनायक, ताल, मेरी जंग, परदेश, हीरो, सौदागर…) ।

पिछले कुछ सालों से “किसना” और “यादें” के रूप में लगातार फ्लॉप फिल्में बना रहें हैं । जिसको मैं सहज रूप से पचा नहीं पता हूँ , क्योंकि मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ । मुझे उनकी हर फिल्मों का बडी बेसब्री से इंतजार होता है । जाहिर है , मुझे फ़िल्म “युवराज” का भी बड़ी शिदत से इंतजार था ।

“युवराज” का सबसे कमजोर पक्ष फिल्म की कहानी ही है , जो दर्शको को सिनेमा हॉल में ३ घंटे तक बैठा पाने में असफल साबित हो सकती है ।

योगेन्द्र युवराज (जावेद शेख) अपने बेटे, देवेन (सलमान) को किसी बात पर घर से निकाल देता है । देवेन अपनी प्रेमिका, अनुष्का (कैटरिना) के साथ “कोरस गायक” के रूप में कहीं और अपनी जिंदगी जी रहा है । मगर अनुष्का का बाप, डॉक्टर बेंटन (बोमन), देवेन को पसंद नहीं करता है, क्योंकि वो उसके हैसियत से मेल नहीं खाता है । देवेन और बेंटन के बीच एक समझौता होता है की अगर ४० दिनों के भीतर वो 1 बिलियन नहीं ला पाता है तो अनुष्का की शादी किसी और के साथ कर देगा । अचानक देवेन को पता लगता है की उसके बाप की मौत हो गई । अब देवेन लंदन का रुख करता है जाएदाद में हिस्सा लेने के लिए । वहाँ योगेंद्र का वकील, सिकन्दर मिर्जा (मिथुन) पुरे परिवार के सामने जब वसीयत पढ़कर सुनाता है तो सबके होश उड़ जातें हैं । दरअसल सारी सम्पति देवेन के बड़े भाई, ज्ञानेश (अनिल कपूर, जो एक मानसिक रोगी है ) को मिल जाती है । अब शुरू होती है सम्पति हासिल की साजिश ,जिसमें परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने स्तर से इस खेल में शामिल जातें हैं । सुखद अंत है, देवेन संपत्ति का लालच त्यागकर रिश्तों को अहमियत देतें हैं ।

इस फ़िल्म का सबसे मजबूत पक्ष संगीत है । “तु मुस्कुरा” और “तु मेरी दोस्त है” , जैसे गीत तो दिलों को छू जातें हैं । कबीर लाल की सिनेमाटोग्राफी लाजवाब है, जो गाने को देखने में भी आँखों को ठंढक प्रदान करती है । फिल्म में वायलन की धुनें, दिल में छुपे एहसास को कुरेदती है । फिल्म “ताल” के बाद एक बार फिर “ए आर रहमान” ने सुभाष घई के भरोसे को कायम रखा है । अनिल कपुर का अभिनय शानदार है ।कुल मिलाकर फिल्म की कहानी में पकड़ नहीं है ।

मुझे उम्मीद है कि घई साहब जब भी अपनी अगली फिल्म का स्क्रीप्ट लिखेंगे, उस वक्त मुझ जैसे फैन के बारे में जरूर सोंचेंगे ।

Saturday, November 1, 2008

राज ठाकरे (एक पहचान की तलाश)

राज ठाकरे ने जब शिव सेना से अलग होकर अपनी पार्टी (मनसे) बनाई, उस समय राज् और उसकी पार्टी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा था । एक ऐसे पहचान की तलाश, जिसकी जरूरत हर नेता को होती है। तब इसके शैतानी दिमाग में देश की एकता और अखंडता के साथ खिलवार करने का तरीका सूझा । अपने आप को मराठिओं का हितैषी बनाने की साजिश रचनी शुरू कर दी । राज् ने खुलकर अपने आप को महारास्ट्र का रहनुमा घोषित कर दिया । उसने महारास्ट्र को सिर्फ़ मराठिओं का प्रदेश बताकर उत्तर भारतीयों के साथ अन्याय
करना शुरू कर दिया ,हिन्दी भाषी छात्रों के ऊपर हमले किए गए , राहुल राज् मामले की अभी जाँच चल रही है ,पवन नाम के छात्र की हत्या कर दी गई, और भी न जाने कितने ही बेगुनाहों की बली चढा दी गई ।
ऐसा होने से आम जनता का तो सिर्फ़ नुकसान ही हुआ लेकिन राज् को मीडिया में जगह मिलने लगी । पुरे देश में राज् के चऱचे होने लगे, शायद उसको इस चीज की जरूरत सबसे ज्यादा थी । यही था उसका सपना , एक अदद अपनी पहचान बनने की ।
राज् को महारास्ट्र के हितों से कोई लेना देना नहीं है ,उसे भी पता है की अगर उत्तर भारतीय इस प्रदेश से चले गए तो इस राज्य के विकास की गति रुक जायेगी ।विभिन्न संस्कृतियों का मिलन ही मुँम्बई को पूणॆ बनाता है , अगर मुंम्बई आथिॅक राजधानी है तो उसका श्रेय गैर मराठिओं को भी जाता है,क्योंकि अधिकाँश गैर मराठिओं के कारखाने तो कहीं और है ,लेकिन उनके मुख्यालय मुँम्बई में ही है और उनके द्वारा दिये गये विभिन्न के प्रकार टैक्स के द्वारा महारास्ट्र सरकार को राजस्व के रूप में मोटी कमाई होती है , मुँम्बई अगर फ़िल्म इंङस्टी्ज के रूप में विकसित है तो सिर्फ़ हिन्दी भाषा की वजह से । छठ पर्व में सूयॆ को प्रणाम किया जाता है ,इस पर्व से सिर्फ़ राज् को परहेज हो सकता है मराठियों को नही । जितने भी विस्फोटक बयान राज ने दिए वो सिर्फ़ और सिर्फ़ राज के निजि विचार हो सकते पूरे मराठिओं का नहीं । मराठी जनता राज् के विचारों की मोहताज नहीं है । इस देश की आम जनता आज भी प्रेम प्यार में ही विस्वाश रखती है ।
हमारा देश कई संस्कृतियों का मिश्रण है , हमें पुरा हक है की हम देश के किसी भी राज्य में रहकर अपना जीवन जी सकें । हम किसी राज ठाकरे को अपने देश की एकता और संप्रभुता की हत्या करने की इजाजत नहीं दे सकते ।
इसके लिए केन्द्र सरकार पुरी तरह से जिम्मेबार है । अगर कोई हमारे देश में जाती,धर्म और क्षेत्र के आधार पर समाज को बांटने की साजिश करे तो वो अपराधी होता है ,और हमारे संविधान में इस तरह के अपराध की सजा भी है । अगर केन्द्र और राज्य सरकार इस अपराध के लिए शुरू में ही राज पर लगाम कसती तो इतने वेगुनाह नहीं मारे जाते । सरकार को इस तरह के देशद्रोहियों से पूरी सख्ती से निपटने की जरूरत है ।
क्या पता कल फिर कोई नया चेहरा किसी दुसरे राज्यों में राज्य हितैसी होने का ढोंग लिए अपनी पहचान की तलाश में निकल जाएगा ।

Friday, October 31, 2008

बिहारी

दि़ल्ली में जब कोई “बस” अचानक रुकती है तो पीछे से आवाज आती है ”ओए बिहारी गाड़ी बढा”।किसी रिक्शेवाले को “बिहारी” बोलकर कोई भी आसानी से अपनी भड़ास निकाल लेता है। मै अक्सर दिल्ली जाता हूँ और इन “उपाधियों” को बड़ी आसानी से कहीं पर भी सुन सकता हूँ। ये कहीं न कहीं उनकी उन कमियों को दशॆाता है जो मुझ जैसा बनने की कोशिश करता है और नाकाम होने के बाद किसी रिक्शेवाले को “बिहारी” बोलकर अपने दिल को तसल्ली देता है।

बिहार से ही shitikanth(IIT topper 2008) प्रौधोगिकी का झँडा बुलंद कर किसी न किसी राज्यों के ऊँचे पदों पर आसीन होते हैं। Mr Anand (Ramanujam classes for IIT, Founder of Super30’s) जिनका हर वषॆ IIT का Result शत् प्रतिशत होता है। पँजाब अगर आनाज ऊत्पादन में अव्वल है तो उसका कारण है “बिहारी श्रम”। दिल्ली का कोई भी दफ्तर बिहारियों बिना अधूरा है। हर दफ्तर के किसी न किसी टेबल पर बिहारी, माउस चलाता नजर आ ही जाएगा।

पू्रवोतर राज्यों में बिहारियों को भगाने की साजिश होती है। महाराष्ट्र में आए दिन बिहारियोँ पर हमले होते रहते हैं। इस वक्त मेरे TV Screen पर Breaking News आ रही है, “मुम्बई में रेलवे की परीक्षा देने आए बिहारियों पर मनसे कायॆकतॆाओं दा्रा हमला”। कहीं न कहीं ये उनकी हताशा और ईष्या को दशॆाता है, हम जैसा न बनने की ? मगर बिहार में सभी राज्य के लोगों को प्यार और सम्मान मिलता है। शायद हमें क्षमा करने की आदत हो गई है।

बिहारी सहनशील, यथातॆवादी, कतॆव्यनिष्ठ, सच्चे, ईमानदार और कोमल हृदयी होते हैं। हम छोटे से छोटे कामों को करने मे सहज महसूस करते हैं। शायद यही वजह है कि कम संसाधनों के वावजूद उन्नत परिणाम देने की क्षमता सिफॆ बिहारियों में ही है। अगर हमारे बिहार में पयॆाप्त संसाधन उपलब्ध हों, तो हमारे अन्दर इतनी काबिलियत है कि हम बिहार का नाम पूरे विश्व में शीषॆ पर रख देंगे।

उस वक्त भी हम आपको क्षमा करते रहेंगे।