राज ठाकरे ने जब शिव सेना से अलग होकर अपनी पार्टी (मनसे) बनाई, उस समय राज् और उसकी पार्टी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा था । एक ऐसे पहचान की तलाश, जिसकी जरूरत हर नेता को होती है। तब इसके शैतानी दिमाग में देश की एकता और अखंडता के साथ खिलवार करने का तरीका सूझा । अपने आप को मराठिओं का हितैषी बनाने की साजिश रचनी शुरू कर दी । राज् ने खुलकर अपने आप को महारास्ट्र का रहनुमा घोषित कर दिया । उसने महारास्ट्र को सिर्फ़ मराठिओं का प्रदेश बताकर उत्तर भारतीयों के साथ अन्याय
करना शुरू कर दिया ,हिन्दी भाषी छात्रों के ऊपर हमले किए गए , राहुल राज् मामले की अभी जाँच चल रही है ,पवन नाम के छात्र की हत्या कर दी गई, और भी न जाने कितने ही बेगुनाहों की बली चढा दी गई ।
ऐसा होने से आम जनता का तो सिर्फ़ नुकसान ही हुआ लेकिन राज् को मीडिया में जगह मिलने लगी । पुरे देश में राज् के चऱचे होने लगे, शायद उसको इस चीज की जरूरत सबसे ज्यादा थी । यही था उसका सपना , एक अदद अपनी पहचान बनने की ।
राज् को महारास्ट्र के हितों से कोई लेना देना नहीं है ,उसे भी पता है की अगर उत्तर भारतीय इस प्रदेश से चले गए तो इस राज्य के विकास की गति रुक जायेगी ।विभिन्न संस्कृतियों का मिलन ही मुँम्बई को पूणॆ बनाता है , अगर मुंम्बई आथिॅक राजधानी है तो उसका श्रेय गैर मराठिओं को भी जाता है,क्योंकि अधिकाँश गैर मराठिओं के कारखाने तो कहीं और है ,लेकिन उनके मुख्यालय मुँम्बई में ही है और उनके द्वारा दिये गये विभिन्न के प्रकार टैक्स के द्वारा महारास्ट्र सरकार को राजस्व के रूप में मोटी कमाई होती है , मुँम्बई अगर फ़िल्म इंङस्टी्ज के रूप में विकसित है तो सिर्फ़ हिन्दी भाषा की वजह से । छठ पर्व में सूयॆ को प्रणाम किया जाता है ,इस पर्व से सिर्फ़ राज् को परहेज हो सकता है मराठियों को नही । जितने भी विस्फोटक बयान राज ने दिए वो सिर्फ़ और सिर्फ़ राज के निजि विचार हो सकते पूरे मराठिओं का नहीं । मराठी जनता राज् के विचारों की मोहताज नहीं है । इस देश की आम जनता आज भी प्रेम प्यार में ही विस्वाश रखती है ।
हमारा देश कई संस्कृतियों का मिश्रण है , हमें पुरा हक है की हम देश के किसी भी राज्य में रहकर अपना जीवन जी सकें । हम किसी राज ठाकरे को अपने देश की एकता और संप्रभुता की हत्या करने की इजाजत नहीं दे सकते ।
इसके लिए केन्द्र सरकार पुरी तरह से जिम्मेबार है । अगर कोई हमारे देश में जाती,धर्म और क्षेत्र के आधार पर समाज को बांटने की साजिश करे तो वो अपराधी होता है ,और हमारे संविधान में इस तरह के अपराध की सजा भी है । अगर केन्द्र और राज्य सरकार इस अपराध के लिए शुरू में ही राज पर लगाम कसती तो इतने वेगुनाह नहीं मारे जाते । सरकार को इस तरह के देशद्रोहियों से पूरी सख्ती से निपटने की जरूरत है ।
क्या पता कल फिर कोई नया चेहरा किसी दुसरे राज्यों में राज्य हितैसी होने का ढोंग लिए अपनी पहचान की तलाश में निकल जाएगा ।
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