चुनाव का मौसम आ गया, नेताओं का बाज़ार सज चुका है, अपने अपने ग्राहकों को लुभाने का काम भी शुरू हो चुका है, सभी नेताओ ने अपने अपने सिद्धांतों की बलि चढाकर दुसरे दलों से समझौता कर लिया है, जो कि उनकी पुरानी फिदरत है । सिद्धांतों कि बलि चढाने में नंबर एक तो हमारे रामबिलाश पासवान जी है । मेरे अनुसार ये सत्ता से हमेशा चिपके रहने वाले नेता हैं, यु पी ऐ सरकार में ये मंत्री हैं और एन डी ऐ सरकार में भी ये महाशय जी मंत्री ही थे, तो फ़िर इनका सिद्धांत क्या है ये तो पता ही नही चलता है । बिहार कि सरकार बनाने के वक्त इनको लालू और भाजपा दोनों से एलर्जी थी, और आज लालू से गठजोड़ करने में इनको जरा भी संकोच नही है । पाँच साल तक सत्ता का सुख भोगने के बाद लालू जी को भी सोनिया मैडम कि शायद अब जरुरत नही है, इसीलिए बिहार में उन्होंने कांग्रेस को नजरअंदाज कर पासवान जी से हाथ मिला लिया, लेकिन आगे भी सत्ता का सुख भोगने का दरवाजा बंद न हो जाए इसलिए अपने आप को यु पी ऐ का ही घटक बताने से भी नही चुक रहे हैं । क्या पता अगली सरकार का गठन भी कांग्रेस के बिना नही हो पाए ?
टेलीविजन पे कई सारे विज्ञापन आ रहे है कि आपका वोट महत्वपूर्ण है और आप वोट जरूर करे । लेकिन सवाल यह है कि हम वोट किसको करें ? ये अपने ही सिद्धांतों को इतनी आसानी से तोड़ देते है तो जनता से किए वादे को तोड़ने में तो इनको जरा भी संकोच नही होगा । अगर मै वोट करता हूँ कांग्रेस को तो वो सरकार किसी के साथ भी मिलकर बना सकती है, हो सकता है कि वो एक ऐसे पार्टी के साथ सरकार बना ले जिसके सिद्धांतों को देश के एक बड़े वर्ग को नापसंद हो ?
देश कि सभी पार्टियों को चुनाव से पहले ही अपने या अपने सहयोगी पार्टियो में से किसी एक को प्रधान मंत्री पद के दावेदार के रूप में घोषित करना चाहिए ताकि देश कि जनता को वोट करने में परेशानी न हो । वोटरों के पास ४-५ प्रधान मंत्री पद के विकल्प होने चाहिए ताकि हम सीधे प्रधान मंत्री को ही वोट कर सके और अच्छे चरित्र वाले व्यक्ति को उस पद पर विठा सके । चुनाव आयोग को भी सभी दलों को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार कि घोषणा को अनिवार्य कर देना चाहिए और चुनाव बाद भी इसका अमल करने को बाध्य कर देना चाहिए ताकि आम जनता के पास बहुत ज्यादा विकल्प न हो ।
जय भारत, जय जनता
Sunday, April 5, 2009
Saturday, February 28, 2009
ऑडिशन इन लखनऊ
२३/०२/२००९ को मेरे सेल पे कॉल आता है कि 'खतरों के खिलाड़ी लेवल २' (के के के २) के ऑडिशन के लिए आपका नाम शार्ट लिस्ट में आया है , और आपको २४/०२/२००९ को पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस के साथ ८ बजे शाम तक ऑडिशन के लिए लखनऊ आना है । किसी रिअल्टी शो के ऑडिशन के लिए ये मेरे जीवन में पहला मौका था इसलिए मै काफ़ी खुश हुआ । इस रिअल्टी शो में शामिल होने के लिए मै दिल से बहुत ज्यादा उत्साहित था । अगले ही दिन सुबह ३ बजे मै फ्रेश होकर लखनऊ के लिए रवाना हो गया । पंजाब मेल लेट थी इसलिए मै बिभूति एक्सप्रेस पकड़कर मुगलसराए पहुँच गया, फ़िर देहरादून एक्सप्रेस पकड़कर वहां से शाम ६.३० बजे लखनऊ पहुँच गया । वहां मुझे 'चांसलर क्लब' ढूंढने में काफी परेशानी हुई, फ़िर भी मै किसी तरह शाम ७.३० तक मै उस क्लब में पहुँचने में सफल हो गया । काफी सारे लड़के ऑडिशन के लिए वहां इकठ्ठा हुए थे । रजिस्ट्रेशन कोड बताने के बाद मुझे अन्दर जाने की अनुमति मिली । क्लब के कैम्पस में स्टाल लगी थी, वहां मेरे नाम को वेरीफाय किया गया । उसके बाद मुझे ५-७ पन्नों वाला एक फॉर्म दिया गया और एक कमरा में बैठकर उसे भरने को कहा गया । फॉर्म भरने में करीब 15-20 मिनट का वक्त लगा । उसके बाद उस फॉर्म के साथ फोटो, पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस का फोटो कॉपी अटैच कर उस फॉर्म को जमा कर दिया । अचानक मेरे शर्ट पे मेरे नाम का टैग लगा एक पोस्टर चिपका दिया और मुझे एक रूम में जाने को कहा गया । उस कमरे में प्रवेश करते ही मै वहां का माहौल देखकर नर्वश हो गया । कमरे के अन्दर में टेबल पर एक लेडीज और एक जेंट्स बैठे थे और उनके बगल में दूसरी टेबल पे ३-४ लोग और बैठे थे । टेक्निशियन मेरे शर्ट और जींस के अन्दर कुछ इंस्ट्रूमेंट फिट कर दिया और मुझे निर्धारित जगह पर खड़े होने को कहा गया । वहां खड़े होने के बाद सवाल और जबाव का दौर शुरू हुआ । मुझसे मेरा नाम और पता कैमरे को देखकर बोलने को कहा गया, उसके बाद मुझसे कई सारे सवाल किए गए, जैसे- आप क्या करते हैं? आप एडवेंचर शो में क्यों शामिल होना चाहते हैं ? आप अक्षय कुमार से मिलकर क्या कहेंगे ? आपमें क्या खासियत है? आप गाना गाते हैं ? अंत में मुझसे एक गाने का मुखड़ा गाने को कहा गया । गाना गाने के बाद मुझसे कहा गया कि अगर आपका सेलेक्शन हुआ तो आपको इन्फार्म किया जाएगा । इस तरह मेरा ऑडिशन समाप्त हो गया । जीवन में एक नए अनुभव के साथ मै पटना कि ओर चल दिया , इस उम्मीद पे कि शायद मेरा सेलेक्शन हो जाए !!!
Sunday, January 18, 2009
पटना का मोना थिएटर
मै बचपन से ही फिल्मो का शौकीन रहा हूँ । मै अपनी रविवार की छुट्टी फ़िल्म देखकर ही बिताता हूँ । करीब पाँच साल पहले मै दिल्ली के मल्टीप्लेक्स के 'वेव सिनेमा' में फ़िल्म देखी थी । इससे पहले मै मॉल और मल्टीप्लेक्स संस्कृति से अनजान था । जब मै पहली बार इस संस्कृति से रूबरू हुआ तो मुझे काफ़ी आश्चर्य हुआ कि ऐसे भी सिनेमाघर होते हैं । उस वक्त मेरे दिल में फ़िल्म देखने की खुशी के साथ साथ हमारे अपने शहर 'पटना' में ऐसी सुविधाओं का अभाव होने का भी दुःख होता था । मै सोंचता था कि काश पटना में भी ऐसे मल्टीप्लेक्स हो, पर दूर दूर तक कोई उम्मीद की किरण दिखाई नही देती थी ।
पटना बिहार की राजधानी है । मनोरंजन के लिए यहाँ कुछ ऊँगली पर गिने सिनेमाघरों के अलावा कुछ खास नही है । करीब दो साल पहले जब पटना में 'विशाल मेगा मार्ट' की इकाई का शुभारम्भ हुआ था उस वक्त एक विशाल जनसैलाब इस मार्ट की ओर कुच कर दिया । कारण स्पष्ट था लोगों में आधुनिक तकनीक से शौपिंग करने की भूख । यह जनसैलाब इस बात को भी प्रमाणित करता है कि पटनाइट्स में आधुनिक सुविधाओं का खर्च वहन करने का भी सामर्थ है ।
पटना का मोना सिनेमा हॉल करीब दो साल पहले बंद कर दिया गया था, चर्चा थी की इसको नए रूप में बनाया जाएगा । कुछ दिन पहले न्यूज़ पेपर में ख़बर छपी की मोना सिनेमा का उदघाटन फलां दिन होने जा रहा है और ये भी बताया गया कि ये मल्टीप्लेक्स जैसी सारी सुविधाओं से लैस है, तो मेरे अन्दर खुसी का ठिकाना न रहा, और मै अगले संडे को इस थिएटर में मूवी देखने का फ़ैसला किया ।
रविवार को जब मै मोना सिनेमा पहुंचा तो बाहर से ये पुराने मोना जैसा ही दिखा, फर्क सिर्फ़ रंग रोगन का ही था । टिकट का दर १५०/- रुपये रखा गया था, जो दिल्ली के विभिन्न मल्टीप्लेक्सों के समतुल्य ही था । कंप्यूटर वाला टिकट के साथ बिल्डिंग के कैम्पस में प्रवेश करते ही सुरक्षा और सिगरेट-गुटका की जाँच की गई । बगल में ही लिफ्ट नजर आई, जिसका निर्माण कार्य अभी चल ही रहा था इसलिए सीढियों से ऊपर गया । जब मै सिनेमा हॉल के अन्दर पहुंचा तो जैसे मेरा पाँच साल पुराना सपना साकार नजर आया । टिकट पर अंकित सीट नंबर को पढ़कर कोई भी अपनी सीट तक आसानी से पहुँच सकता था । मै भी बिना किसी से पूछे ही अपनी सीट तक पहुँच गया । मखमली कालीन और सोफेदार सीट को देखकर मुझे ' इ डी एम का पीवीआर सिनेमा ' याद आ गया जहाँ मै अक्सर फ़िल्म देखा करता था । आधुनिक प्रोजेक्शन और डोल्बी डिजीटल साउंड इस थिएटर को मल्टीप्लेक्स सरीखे सिनेमा हॉल की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया । कुल मिलाकर ये सिनेमाहाल मल्टीप्लेक्स वाली सारी सुविधाओं से लैस एक सिन्गल्प्लेक्स है ।
पटना को महानगर वाली सुविधाए मुहैया कराने के लिए मै इस थिएटर के मालिक काटारुका जी को दिल से बधाई देता हूँ ।
पटना बिहार की राजधानी है । मनोरंजन के लिए यहाँ कुछ ऊँगली पर गिने सिनेमाघरों के अलावा कुछ खास नही है । करीब दो साल पहले जब पटना में 'विशाल मेगा मार्ट' की इकाई का शुभारम्भ हुआ था उस वक्त एक विशाल जनसैलाब इस मार्ट की ओर कुच कर दिया । कारण स्पष्ट था लोगों में आधुनिक तकनीक से शौपिंग करने की भूख । यह जनसैलाब इस बात को भी प्रमाणित करता है कि पटनाइट्स में आधुनिक सुविधाओं का खर्च वहन करने का भी सामर्थ है ।
पटना का मोना सिनेमा हॉल करीब दो साल पहले बंद कर दिया गया था, चर्चा थी की इसको नए रूप में बनाया जाएगा । कुछ दिन पहले न्यूज़ पेपर में ख़बर छपी की मोना सिनेमा का उदघाटन फलां दिन होने जा रहा है और ये भी बताया गया कि ये मल्टीप्लेक्स जैसी सारी सुविधाओं से लैस है, तो मेरे अन्दर खुसी का ठिकाना न रहा, और मै अगले संडे को इस थिएटर में मूवी देखने का फ़ैसला किया ।
रविवार को जब मै मोना सिनेमा पहुंचा तो बाहर से ये पुराने मोना जैसा ही दिखा, फर्क सिर्फ़ रंग रोगन का ही था । टिकट का दर १५०/- रुपये रखा गया था, जो दिल्ली के विभिन्न मल्टीप्लेक्सों के समतुल्य ही था । कंप्यूटर वाला टिकट के साथ बिल्डिंग के कैम्पस में प्रवेश करते ही सुरक्षा और सिगरेट-गुटका की जाँच की गई । बगल में ही लिफ्ट नजर आई, जिसका निर्माण कार्य अभी चल ही रहा था इसलिए सीढियों से ऊपर गया । जब मै सिनेमा हॉल के अन्दर पहुंचा तो जैसे मेरा पाँच साल पुराना सपना साकार नजर आया । टिकट पर अंकित सीट नंबर को पढ़कर कोई भी अपनी सीट तक आसानी से पहुँच सकता था । मै भी बिना किसी से पूछे ही अपनी सीट तक पहुँच गया । मखमली कालीन और सोफेदार सीट को देखकर मुझे ' इ डी एम का पीवीआर सिनेमा ' याद आ गया जहाँ मै अक्सर फ़िल्म देखा करता था । आधुनिक प्रोजेक्शन और डोल्बी डिजीटल साउंड इस थिएटर को मल्टीप्लेक्स सरीखे सिनेमा हॉल की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया । कुल मिलाकर ये सिनेमाहाल मल्टीप्लेक्स वाली सारी सुविधाओं से लैस एक सिन्गल्प्लेक्स है ।
पटना को महानगर वाली सुविधाए मुहैया कराने के लिए मै इस थिएटर के मालिक काटारुका जी को दिल से बधाई देता हूँ ।
Wednesday, December 24, 2008
धोनी का मन्दिर
ये भारत है , ये अपना इंडिया है, यहाँ कुछ भी संभव है । धोनी फैन्स क्लब ने रांची में धोनी का मन्दिर बनवाने का फ़ैसला किया है । एक इंसान को भगवान बनाने की पागलपन कोशिश ।
न्यूज़ चैनल वालों ने उस जगह को पूरे ग्राफिक्स के साथ दिखाया जहाँ पर 'धोनी भगवान' के मन्दिर का निर्माण कार्य चल रहा है । फलां जगह पर धोनी की मूर्ति होगी , वहां पे भव्य गेट होगा, वहां पे श्रधालुओं के बैठने की जगह होगी, वगैरह-वगैरह ............।
मुझे किसी के निजी विचारों से कोई परेशानी नहीं है लेकिन वो निजी विचार अगर सार्वजनिक कर दिए जाए तो तकलीफ हो सकती है क्योंकि ये करोड़ों लोगों के आस्था और श्रद्धा से जुड़ा विषय है । 'भगवान' कोई उपाधि नही है जो किसी को पुरस्कार स्वरूप प्रदान कर दी जाए । ये तो हमारे संस्कारों में रचा बसा है ।
अगर आप किसी को सम्मान देना चाहते है तो उस सम्मान को व्यक्त करने के और भी रास्ते है । आप धोनी के नाम से संग्रहालय और स्टेडियम भी बनबा सकते है, मगर भगवान का इस तरह मजाक बनाना ठीक नही ।
धोनी के माता पिता ने इस मुद्दे को लेकर जोरदार विरोध जताया है, कि अगर फैन्स क्लब वालों ने इस काम को तुंरत नहीं रोका तो उनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्यवाई करेंगे । उनका तर्क है कि हमारे यहाँ मरे लोगों के साथ ऐसा होता है लेकिन हमारा तर्क ईशवर के अस्तित्व के मजाक बनाने को लेकर है ।
किसी को कोई हक़ नहीं बनता कि वो सदियों पुरानी चली आ रही करोड़ों लोगों के भगवान के प्रति श्रद्धा और विस्वास का इस तरह मजाक बनाए । अगर इसी तरह इंसानों के मन्दिर बनाए जाने लगे तो इंसान और भगवान में क्या फर्क रह जाएगा ?
न्यूज़ चैनल वालों ने उस जगह को पूरे ग्राफिक्स के साथ दिखाया जहाँ पर 'धोनी भगवान' के मन्दिर का निर्माण कार्य चल रहा है । फलां जगह पर धोनी की मूर्ति होगी , वहां पे भव्य गेट होगा, वहां पे श्रधालुओं के बैठने की जगह होगी, वगैरह-वगैरह ............।
मुझे किसी के निजी विचारों से कोई परेशानी नहीं है लेकिन वो निजी विचार अगर सार्वजनिक कर दिए जाए तो तकलीफ हो सकती है क्योंकि ये करोड़ों लोगों के आस्था और श्रद्धा से जुड़ा विषय है । 'भगवान' कोई उपाधि नही है जो किसी को पुरस्कार स्वरूप प्रदान कर दी जाए । ये तो हमारे संस्कारों में रचा बसा है ।
अगर आप किसी को सम्मान देना चाहते है तो उस सम्मान को व्यक्त करने के और भी रास्ते है । आप धोनी के नाम से संग्रहालय और स्टेडियम भी बनबा सकते है, मगर भगवान का इस तरह मजाक बनाना ठीक नही ।
धोनी के माता पिता ने इस मुद्दे को लेकर जोरदार विरोध जताया है, कि अगर फैन्स क्लब वालों ने इस काम को तुंरत नहीं रोका तो उनके ख़िलाफ़ कानूनी कार्यवाई करेंगे । उनका तर्क है कि हमारे यहाँ मरे लोगों के साथ ऐसा होता है लेकिन हमारा तर्क ईशवर के अस्तित्व के मजाक बनाने को लेकर है ।
किसी को कोई हक़ नहीं बनता कि वो सदियों पुरानी चली आ रही करोड़ों लोगों के भगवान के प्रति श्रद्धा और विस्वास का इस तरह मजाक बनाए । अगर इसी तरह इंसानों के मन्दिर बनाए जाने लगे तो इंसान और भगवान में क्या फर्क रह जाएगा ?
Tuesday, December 2, 2008
आम जनता, आतंकवाद और राजनीति
26-11-2008, मुंबई में अब तक का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला । इस हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया । समुन्द्र के रास्ते करीब १०-१५ आतंकवादियों का जत्था, बड़ी मात्रा में असहलों के साथ मुंबई में प्रवेश कर जाता है, ये इस बात को प्रमाणित करता है कि हमारा समुंद्री तट कितना सुरक्षित है ? भारत एक ऐसा देश बन चुका है, जहाँ कोई भी आसानी से दहशत को अंजाम दे सकता है । इस आतंकवाद का सबसे आसान टारगेट आम जनता ही होती है, जिसमें कई घर इस बर्बादी के शिकार हो जातें हैं, कई परिवार विखर जातें हैं ।
इस घटना के बाद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री "आर आर पाटिल" का बयान आता है कि "मुंबई एक बड़ा शहर है और ऐसी छोटी मोटी घटनाएं होती रहती है"। अगर इस दुर्घटना में उनके परिवार का कोई सदस्य मारा जाता, तब भी ये हादसा छोटा मोटा ही होता ? हर आतंकवादी हमले के बाद नेताओं का रटा-रटाया बयान आता है ,कि
"ये कायराना हरकत है",
"हमें आतंकवाद के ख़िलाफ़ सख्ती से निपटने कि जरुरत है",
"हम इसकी निंदा करते हैं",
"आतंकवाद को अब और बर्दाश्त नहीं किया जायगा", वगैरह-वगैरह....................। अब हमलोग इस बयानबाजी से उब चुके हैं । आतंकवादी हमले के बाद "संजय निरुपम" जब जनता के बीच गए तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा । देश में कई जगहों पर लोगों ने नेताओं के ख़िलाफ़ बिरोध प्रदर्शन किया । ये इस बात को प्रमाणित करता है कि हमें अब बयानबाजी नहीं, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम चाहिए । शिवराज पाटिल इस देश के गृह मंत्री थे, इस घटना को रोकने की जिम्मेदारी उनकी थी, लेकिन उनका ज्यादा वक्त ड्रेस डिजायनिंग में ही गुजरता था ।
इस देश की सुरक्षा एजेंसियां भी अपने आपको श्रेष्ठ होने की दौर में ही शामिल रखती है, की मैंने तो ये सुचना २ साल पहले ही दे दी थी, अब आपने नहीं किया तो मैं क्या करूं ।
अब ये आतंकवादी देश के बड़े होटलों के टारगेट कर रहें हैं, जिससे आम लोगों के साथ साथ देश के धनाढ्य वर्ग के लोगों पर भी हमला किया जा सके, ताकि इस देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया जा सके ।
अब वक्त आ गया है, कि देश के सभी बड़े नेता इमानदारी पूर्वक आपस में मिलजुलकर आत्ममंथन करें, कि क्या वे वाकई इस देश की सुरक्षा के प्रति उतने गंभीर हैं, जितनी आम लोगों को उनसे उम्मीदें हैं ? वोटों की राजनीति से ज्यादा जरुरी है हमारे देश का आत्मसम्मान ।
इस घटना के बाद महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री "आर आर पाटिल" का बयान आता है कि "मुंबई एक बड़ा शहर है और ऐसी छोटी मोटी घटनाएं होती रहती है"। अगर इस दुर्घटना में उनके परिवार का कोई सदस्य मारा जाता, तब भी ये हादसा छोटा मोटा ही होता ? हर आतंकवादी हमले के बाद नेताओं का रटा-रटाया बयान आता है ,कि
"ये कायराना हरकत है",
"हमें आतंकवाद के ख़िलाफ़ सख्ती से निपटने कि जरुरत है",
"हम इसकी निंदा करते हैं",
"आतंकवाद को अब और बर्दाश्त नहीं किया जायगा", वगैरह-वगैरह....................। अब हमलोग इस बयानबाजी से उब चुके हैं । आतंकवादी हमले के बाद "संजय निरुपम" जब जनता के बीच गए तो उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा । देश में कई जगहों पर लोगों ने नेताओं के ख़िलाफ़ बिरोध प्रदर्शन किया । ये इस बात को प्रमाणित करता है कि हमें अब बयानबाजी नहीं, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम चाहिए । शिवराज पाटिल इस देश के गृह मंत्री थे, इस घटना को रोकने की जिम्मेदारी उनकी थी, लेकिन उनका ज्यादा वक्त ड्रेस डिजायनिंग में ही गुजरता था ।
इस देश की सुरक्षा एजेंसियां भी अपने आपको श्रेष्ठ होने की दौर में ही शामिल रखती है, की मैंने तो ये सुचना २ साल पहले ही दे दी थी, अब आपने नहीं किया तो मैं क्या करूं ।
अब ये आतंकवादी देश के बड़े होटलों के टारगेट कर रहें हैं, जिससे आम लोगों के साथ साथ देश के धनाढ्य वर्ग के लोगों पर भी हमला किया जा सके, ताकि इस देश की अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया जा सके ।
अब वक्त आ गया है, कि देश के सभी बड़े नेता इमानदारी पूर्वक आपस में मिलजुलकर आत्ममंथन करें, कि क्या वे वाकई इस देश की सुरक्षा के प्रति उतने गंभीर हैं, जितनी आम लोगों को उनसे उम्मीदें हैं ? वोटों की राजनीति से ज्यादा जरुरी है हमारे देश का आत्मसम्मान ।
Monday, November 24, 2008
सुभाष घई का घटता क्रेज़

फ़िल्म इंडस्ट्रीज में सुभाष घई को “शो मैन” का दर्जा प्राप्त है और शायद इसकी वज़ह भी है । वो साल में सिर्फ़ एक ही फ़िल्म बनाते हैं, कैमरे के विभिन्न कोणों का प्रयोग वे बखूबी जानते हैं । उनकी हर फ़िल्म में शास्त्रीय संगीत का मिश्रण और आकर्षक लोकेशन फ़िल्म को भव्यता प्रदान करता है । जिसके वे माहिर खिलाड़ी हैं । सुभाष घई के निर्देशन में बनने वाली हर फ़िल्म प्रदर्शन से पहले ही हीट मानी जाती थी, क्योंकि उनकी फ़िल्म का हर पक्ष ( जैसे - स्टोरी, संगीत, सिनेमाटोग्राफी, डांस, डायलोग ) काफ़ी मजबूती से फ़िल्म के साथ खड़ा होता था । इसके कई उदाहरण भी हैं, (जैसे- राम लखन, कर्मा, खलनायक, ताल, मेरी जंग, परदेश, हीरो, सौदागर…) ।
पिछले कुछ सालों से “किसना” और “यादें” के रूप में लगातार फ्लॉप फिल्में बना रहें हैं । जिसको मैं सहज रूप से पचा नहीं पता हूँ , क्योंकि मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ । मुझे उनकी हर फिल्मों का बडी बेसब्री से इंतजार होता है । जाहिर है , मुझे फ़िल्म “युवराज” का भी बड़ी शिदत से इंतजार था ।
“युवराज” का सबसे कमजोर पक्ष फिल्म की कहानी ही है , जो दर्शको को सिनेमा हॉल में ३ घंटे तक बैठा पाने में असफल साबित हो सकती है ।
योगेन्द्र युवराज (जावेद शेख) अपने बेटे, देवेन (सलमान) को किसी बात पर घर से निकाल देता है । देवेन अपनी प्रेमिका, अनुष्का (कैटरिना) के साथ “कोरस गायक” के रूप में कहीं और अपनी जिंदगी जी रहा है । मगर अनुष्का का बाप, डॉक्टर बेंटन (बोमन), देवेन को पसंद नहीं करता है, क्योंकि वो उसके हैसियत से मेल नहीं खाता है । देवेन और बेंटन के बीच एक समझौता होता है की अगर ४० दिनों के भीतर वो 1 बिलियन नहीं ला पाता है तो अनुष्का की शादी किसी और के साथ कर देगा । अचानक देवेन को पता लगता है की उसके बाप की मौत हो गई । अब देवेन लंदन का रुख करता है जाएदाद में हिस्सा लेने के लिए । वहाँ योगेंद्र का वकील, सिकन्दर मिर्जा (मिथुन) पुरे परिवार के सामने जब वसीयत पढ़कर सुनाता है तो सबके होश उड़ जातें हैं । दरअसल सारी सम्पति देवेन के बड़े भाई, ज्ञानेश (अनिल कपूर, जो एक मानसिक रोगी है ) को मिल जाती है । अब शुरू होती है सम्पति हासिल की साजिश ,जिसमें परिवार के सभी सदस्य अपने-अपने स्तर से इस खेल में शामिल जातें हैं । सुखद अंत है, देवेन संपत्ति का लालच त्यागकर रिश्तों को अहमियत देतें हैं ।
इस फ़िल्म का सबसे मजबूत पक्ष संगीत है । “तु मुस्कुरा” और “तु मेरी दोस्त है” , जैसे गीत तो दिलों को छू जातें हैं । कबीर लाल की सिनेमाटोग्राफी लाजवाब है, जो गाने को देखने में भी आँखों को ठंढक प्रदान करती है । फिल्म में वायलन की धुनें, दिल में छुपे एहसास को कुरेदती है । फिल्म “ताल” के बाद एक बार फिर “ए आर रहमान” ने सुभाष घई के भरोसे को कायम रखा है । अनिल कपुर का अभिनय शानदार है ।कुल मिलाकर फिल्म की कहानी में पकड़ नहीं है ।
मुझे उम्मीद है कि घई साहब जब भी अपनी अगली फिल्म का स्क्रीप्ट लिखेंगे, उस वक्त मुझ जैसे फैन के बारे में जरूर सोंचेंगे ।
Saturday, November 1, 2008
राज ठाकरे (एक पहचान की तलाश)
राज ठाकरे ने जब शिव सेना से अलग होकर अपनी पार्टी (मनसे) बनाई, उस समय राज् और उसकी पार्टी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा था । एक ऐसे पहचान की तलाश, जिसकी जरूरत हर नेता को होती है। तब इसके शैतानी दिमाग में देश की एकता और अखंडता के साथ खिलवार करने का तरीका सूझा । अपने आप को मराठिओं का हितैषी बनाने की साजिश रचनी शुरू कर दी । राज् ने खुलकर अपने आप को महारास्ट्र का रहनुमा घोषित कर दिया । उसने महारास्ट्र को सिर्फ़ मराठिओं का प्रदेश बताकर उत्तर भारतीयों के साथ अन्याय
करना शुरू कर दिया ,हिन्दी भाषी छात्रों के ऊपर हमले किए गए , राहुल राज् मामले की अभी जाँच चल रही है ,पवन नाम के छात्र की हत्या कर दी गई, और भी न जाने कितने ही बेगुनाहों की बली चढा दी गई ।
ऐसा होने से आम जनता का तो सिर्फ़ नुकसान ही हुआ लेकिन राज् को मीडिया में जगह मिलने लगी । पुरे देश में राज् के चऱचे होने लगे, शायद उसको इस चीज की जरूरत सबसे ज्यादा थी । यही था उसका सपना , एक अदद अपनी पहचान बनने की ।
राज् को महारास्ट्र के हितों से कोई लेना देना नहीं है ,उसे भी पता है की अगर उत्तर भारतीय इस प्रदेश से चले गए तो इस राज्य के विकास की गति रुक जायेगी ।विभिन्न संस्कृतियों का मिलन ही मुँम्बई को पूणॆ बनाता है , अगर मुंम्बई आथिॅक राजधानी है तो उसका श्रेय गैर मराठिओं को भी जाता है,क्योंकि अधिकाँश गैर मराठिओं के कारखाने तो कहीं और है ,लेकिन उनके मुख्यालय मुँम्बई में ही है और उनके द्वारा दिये गये विभिन्न के प्रकार टैक्स के द्वारा महारास्ट्र सरकार को राजस्व के रूप में मोटी कमाई होती है , मुँम्बई अगर फ़िल्म इंङस्टी्ज के रूप में विकसित है तो सिर्फ़ हिन्दी भाषा की वजह से । छठ पर्व में सूयॆ को प्रणाम किया जाता है ,इस पर्व से सिर्फ़ राज् को परहेज हो सकता है मराठियों को नही । जितने भी विस्फोटक बयान राज ने दिए वो सिर्फ़ और सिर्फ़ राज के निजि विचार हो सकते पूरे मराठिओं का नहीं । मराठी जनता राज् के विचारों की मोहताज नहीं है । इस देश की आम जनता आज भी प्रेम प्यार में ही विस्वाश रखती है ।
हमारा देश कई संस्कृतियों का मिश्रण है , हमें पुरा हक है की हम देश के किसी भी राज्य में रहकर अपना जीवन जी सकें । हम किसी राज ठाकरे को अपने देश की एकता और संप्रभुता की हत्या करने की इजाजत नहीं दे सकते ।
इसके लिए केन्द्र सरकार पुरी तरह से जिम्मेबार है । अगर कोई हमारे देश में जाती,धर्म और क्षेत्र के आधार पर समाज को बांटने की साजिश करे तो वो अपराधी होता है ,और हमारे संविधान में इस तरह के अपराध की सजा भी है । अगर केन्द्र और राज्य सरकार इस अपराध के लिए शुरू में ही राज पर लगाम कसती तो इतने वेगुनाह नहीं मारे जाते । सरकार को इस तरह के देशद्रोहियों से पूरी सख्ती से निपटने की जरूरत है ।
क्या पता कल फिर कोई नया चेहरा किसी दुसरे राज्यों में राज्य हितैसी होने का ढोंग लिए अपनी पहचान की तलाश में निकल जाएगा ।
करना शुरू कर दिया ,हिन्दी भाषी छात्रों के ऊपर हमले किए गए , राहुल राज् मामले की अभी जाँच चल रही है ,पवन नाम के छात्र की हत्या कर दी गई, और भी न जाने कितने ही बेगुनाहों की बली चढा दी गई ।
ऐसा होने से आम जनता का तो सिर्फ़ नुकसान ही हुआ लेकिन राज् को मीडिया में जगह मिलने लगी । पुरे देश में राज् के चऱचे होने लगे, शायद उसको इस चीज की जरूरत सबसे ज्यादा थी । यही था उसका सपना , एक अदद अपनी पहचान बनने की ।
राज् को महारास्ट्र के हितों से कोई लेना देना नहीं है ,उसे भी पता है की अगर उत्तर भारतीय इस प्रदेश से चले गए तो इस राज्य के विकास की गति रुक जायेगी ।विभिन्न संस्कृतियों का मिलन ही मुँम्बई को पूणॆ बनाता है , अगर मुंम्बई आथिॅक राजधानी है तो उसका श्रेय गैर मराठिओं को भी जाता है,क्योंकि अधिकाँश गैर मराठिओं के कारखाने तो कहीं और है ,लेकिन उनके मुख्यालय मुँम्बई में ही है और उनके द्वारा दिये गये विभिन्न के प्रकार टैक्स के द्वारा महारास्ट्र सरकार को राजस्व के रूप में मोटी कमाई होती है , मुँम्बई अगर फ़िल्म इंङस्टी्ज के रूप में विकसित है तो सिर्फ़ हिन्दी भाषा की वजह से । छठ पर्व में सूयॆ को प्रणाम किया जाता है ,इस पर्व से सिर्फ़ राज् को परहेज हो सकता है मराठियों को नही । जितने भी विस्फोटक बयान राज ने दिए वो सिर्फ़ और सिर्फ़ राज के निजि विचार हो सकते पूरे मराठिओं का नहीं । मराठी जनता राज् के विचारों की मोहताज नहीं है । इस देश की आम जनता आज भी प्रेम प्यार में ही विस्वाश रखती है ।
हमारा देश कई संस्कृतियों का मिश्रण है , हमें पुरा हक है की हम देश के किसी भी राज्य में रहकर अपना जीवन जी सकें । हम किसी राज ठाकरे को अपने देश की एकता और संप्रभुता की हत्या करने की इजाजत नहीं दे सकते ।
इसके लिए केन्द्र सरकार पुरी तरह से जिम्मेबार है । अगर कोई हमारे देश में जाती,धर्म और क्षेत्र के आधार पर समाज को बांटने की साजिश करे तो वो अपराधी होता है ,और हमारे संविधान में इस तरह के अपराध की सजा भी है । अगर केन्द्र और राज्य सरकार इस अपराध के लिए शुरू में ही राज पर लगाम कसती तो इतने वेगुनाह नहीं मारे जाते । सरकार को इस तरह के देशद्रोहियों से पूरी सख्ती से निपटने की जरूरत है ।
क्या पता कल फिर कोई नया चेहरा किसी दुसरे राज्यों में राज्य हितैसी होने का ढोंग लिए अपनी पहचान की तलाश में निकल जाएगा ।
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